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Monday, July 28, 2014
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Friday, July 18, 2014
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Monday, April 9, 2012
छोटे मियां,
जी चाहा के ख़त लिखूं । पर आदत जाती रही है ।
अब खतो- खतावत का ज़माना भी तो रहा नहीं । अब तो नया दौर है । ब-ज़बाने
Facebook या Internet पल भर में कुछ कह दिया कुछ भी सुन लिया । पर इस ज़रिया-ऐ-गुफ्तगू में वो खुशबू नहीं है । कागज़ पर सियाही से उतरे लफ्ज़ों की लम्बी उम्र होती है । वो लफ्ज़ एहसासों के पंख लगा कर दिल तक जाते हैं । लिखने वाला पढने वाले को अपने जज्बातों की दुनिया में ले जाता है । मैं भी पुराने ज़माने का हूँ । पुराने सलवटों में उलझे, पीले पड़े हुए ख़त, कुछ अब भी रख छोड़े हैं मैने। उन खतों के काँधों पर चढ़ कर मैं आज भी उसी दुनिया में उतर जाता हूँ ।
हाँ लेकिन ये भी सही है है की अरसा हुआ कोई ख़त लिखा नहीं है मैंने।
तुम्हारी मां को भी नहीं जिसे अक्सर ख़त लिखा करता था कभी । अब तो ख़याल दिल में अगर होते भी हैं
तो भी सही लफ्ज़ों
मे ढल नहीं पाते । लिखना भी एक आदत है । न लिखो कुछ दिनों तक तो अलफ़ाज़ साथ छोड़ने लगते हैं । फिर सही जुबां भी तो हो। बाबा जी ( दादा ; हमारे दादा मरहूम , खुदा ने उन्हें जन्नत बक्शी होगी ) कितनी कोशिश की थी उन्होनें की उर्दू सीख पाता मैं । पर अलिफ़, बे, पे, ते, से आगे बढ़ नहीं पाया कभी । हम नौं भाई बहन थे पर दादा जी ने फिर भी चाहा की मैं ही उर्दू सीखूं। उनकी सोच क्या थी ये तो वो ही जानें पर ये ज़ुरूर है की आगे चल कर कविता, शायरी की तरफ मेरा झुकाव ज्यादा रहा। आज सोचता हूँ की उर्दू सीखी होती तो उर्दू साहित्य की कितनी बड़ी दुनिया खुल जाती मेरे सामने। हर चीज़ जो लिखी जाती है उसका तर्जुमा कहाँ हो पाता है। उर्दू तो सीख नहीं पाया पर बाबा जी के सानिध्य मैं जो सीखा वो किसी किताब किसी तजुर्बे ने नहीं सिखाया। बाबा जी घर के बड़े थे; नसीहत करना उनका हक भी था और शौक़ भी । बात बात मैं मिर्ज़ा ग़ालिब , ज़ौक, मीर तकी मीर, कबीर , रहीम, या तुलसीदस जी को quote किया करते थे । हर मौजू पर एक शेर या दोहा हुआ करता था उनके पास। मुझे पहाड़े याद करनें मैं दिक्कत होती तो कहते
खुदी को कर बुलंद इतना की हर तदबीर से पहले
खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है,
खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है,
कभी इसी बात को कुछ यूं कहते ,
मंजिले मक़सूद का पाना तो कुछ मुश्किल नहीं
तूने सरगर्मी से मंजिल को कभी ढूंडा नहीं .
तूने सरगर्मी से मंजिल को कभी ढूंडा नहीं .
गीता , महाभारत
, और पंचतंत्र की कहानितान हमनें पढीं तो बाद मैं भी कई बार पर आत्मसात वो हुआ, ज़हन मैं वो बसा, जो मतलब उन्होंने समझाया । कुछ किस्से किताबों कहानियों के, कुछ वाबस्ता उनकी अपनी दौरे ज़िन्दगी से , उस किस्सा गोई के दौरान रातें कितनी लम्बी हुआ करती थीं। उस दौरान जो सीखा उसका एहसास तब नहीं हो पाया था। अब ज़िन्दगी एक ठोकर देती है बाबा जी याद आते हैं.
वो शायद सब कुछ देख गए हैं सब कुछ कह गए हैं .
तो, ये सोचा है मैनें के ख़त लिखूंगा अब से, और और मेरे लख्ते जिगर, तुम्हारे पास मुझे सुनने के अलावा कोई दूसरा option भी नहीं है । अब जब की दादा जी नहीं हैं तो नसीहत करना मेरा भी हक भी है और शौक़ भी । छोटे मियां तुम कर भी क्या सकते हो । मैं लिखता हूँ तुम पढो । हाँ ये ज़ुरूर है की अपनी ख़ुशी के लिए कलम दवात सियाही से कागज़ पे तो लिखूंगा ही पर तुम्हारे ज़माने की technology से बेहिस भी नहीं रहूँगा ,
बेटा जी
कोई सूरत तो हो तुमको की सुनना लाज़मी हो जाए,
अभी कहना बहुत 'तनहा' को है सुनना बहुत तुमको ।
अभी कहना बहुत 'तनहा' को है सुनना बहुत तुमको ।
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