Monday, April 9, 2012

छोटे मियां,

जी चाहा के ख़त लिखूं पर आदत जाती रही है
अब खतो- खतावत का ज़माना भी तो रहा नहीं अब तो नया दौर है -ज़बाने Facebook या Internet पल भर में कुछ कह दिया कुछ भी सुन लिया पर इस ज़रिया-ऐ-गुफ्तगू में वो खुशबू नहीं है कागज़ पर सियाही से उतरे लफ्ज़ों की लम्बी उम्र होती है वो लफ्ज़ एहसासों के पंख लगा कर दिल तक जाते हैं लिखने वाला पढने वाले को अपने जज्बातों की दुनिया में ले जाता है मैं भी पुराने ज़माने का हूँ पुराने सलवटों में उलझे, पीले पड़े हुए ख़त, कुछ अब भी रख छोड़े हैं मैने। उन खतों के काँधों पर चढ़ कर मैं आज भी उसी दुनिया में उतर जाता हूँ
हाँ लेकिन ये भी सही है है की अरसा हुआ कोई ख़त लिखा नहीं है मैंने। तुम्हारी मां को भी नहीं जिसे अक्सर ख़त लिखा करता था कभी अब तो ख़याल दिल में अगर होते भी हैं तो भी सही लफ्ज़ों मे ढल नहीं पाते लिखना भी एक आदत है लिखो कुछ दिनों तक तो अलफ़ाज़ साथ छोड़ने लगते हैं फिर सही जुबां भी तो हो। बाबा जी ( दादा ; हमारे दादा मरहूम , खुदा ने उन्हें जन्नत बक्शी होगी ) कितनी कोशिश की थी उन्होनें की उर्दू सीख पाता मैं पर अलिफ़, बे, पे, ते, से आगे बढ़ नहीं पाया  कभी । हम नौं भाई बहन थे पर दादा जी ने फिर भी चाहा की मैं ही उर्दू सीखूं। उनकी सोच क्या थी ये तो वो ही जानें पर ये ज़ुरूर है की आगे चल कर कविता, शायरी की तरफ मेरा झुकाव ज्यादा रहा। आज सोचता हूँ की उर्दू सीखी होती तो उर्दू साहित्य की कितनी बड़ी दुनिया खुल जाती मेरे सामने। हर चीज़ जो लिखी जाती है उसका तर्जुमा कहाँ हो पाता है। उर्दू तो सीख नहीं पाया पर बाबा जी के सानिध्य मैं जो सीखा वो किसी किताब किसी तजुर्बे ने नहीं सिखाया। बाबा जी घर के बड़े थे; नसीहत करना उनका हक भी था और शौक़ भी बात बात मैं मिर्ज़ा ग़ालिब , ज़ौक, मीर तकी मीर, कबीर , रहीम, या तुलसीदस जी को quote किया करते थे हर मौजू पर एक शेर या दोहा हुआ करता था उनके पास। मुझे पहाड़े याद करनें मैं दिक्कत होती तो कहते
खुदी को कर बुलंद इतना की हर तदबीर से पहले
खुदा
बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है,
कभी इसी बात को कुछ यूं कहते ,
मंजिले मक़सूद का पाना तो कुछ मुश्किल नहीं
तूने
सरगर्मी से मंजिल को कभी ढूंडा नहीं .
गीता , महाभारत , और पंचतंत्र की कहानितान हमनें पढीं तो बाद मैं भी कई बार पर आत्मसात वो हुआ, ज़हन मैं वो बसा, जो मतलब उन्होंने समझाया कुछ किस्से किताबों कहानियों के, कुछ वाबस्ता उनकी अपनी दौरे ज़िन्दगी से , उस किस्सा गोई के दौरान रातें कितनी लम्बी हुआ करती थीं। उस दौरान जो सीखा उसका एहसास तब नहीं हो पाया था। अब ज़िन्दगी एक ठोकर देती है बाबा जी याद आते हैं.
वो शायद सब कुछ देख गए हैं सब कुछ कह गए हैं .
तो, ये सोचा है मैनें के ख़त लिखूंगा अब से, और और मेरे लख्ते जिगर, तुम्हारे पास मुझे सुनने के अलावा कोई दूसरा option भी नहीं है अब जब की दादा जी नहीं हैं तो नसीहत करना मेरा भी हक भी है और शौक़ भी छोटे मियां तुम कर भी क्या सकते हो मैं लिखता हूँ तुम पढो हाँ ये ज़ुरूर है की अपनी ख़ुशी के लिए कलम दवात सियाही से कागज़ पे तो लिखूंगा ही पर तुम्हारे ज़माने की technology से बेहिस भी नहीं रहूँगा ,
बेटा जी
कोई सूरत तो हो तुमको की सुनना लाज़मी हो जाए,
अभी कहना बहुत 'तनहा' को है सुनना बहुत तुमको



1 comments:

Kumar Chitrang said...

प्रिय पापाजी

अरसा तो हुआ है कोई भी ख़त लिखे. मगर गुनाह न आपका न मेरा, अगर है तो दोनों का ही. एक वक़्त था जब हमराह, हमसफ़र था दोनों के दिल का हाल. अब वक़्त बदल गया है शायद. ब्लॉग पे लिखने के बाद फ़ोन पे भी बाल कि खाल उधेड़ते थे, शायद दिक्क़तें समान हुआ करती थीं शायद. अब हैं अलग-अलग, पर कोई बात नहीं. जिस दिन से फीते बाँध कर चलना शुरू किया है, उस दिन से एक ही बात समझ में आती है. इस राह का अपना एक किरदार है, बिछड़ना मिलना कोई ख़ास बात नहीं... बस एक सिलसिला है मुसलसल, ये करवाती है हमसे. तब के गए थे, अब जो वापस आये हैं, तो उठाते हैं वही सिरा जिसे छोड़ा था. बैठने दो फिर वही महफ़िल, भिड़े इक बार फिर वही तांता. बहुत कोशिश करी हमनें कि वक़्त से पहले हो पाता मगर... आगे जो है वो already आपकी-मेरी जुबां पर है.

तो हो जाए. इक नया पन्ना है इक नए साल का. अब तो creative pursuit भी एकदिशा है. अब तो मिल के काम भी करना है, मेरी आशा तो यह है कि बरसों कि दबी जो वो लालसा है अन्दर, मेरी कहानियों के ज़रिये निकले बाहर. और यहाँ मुझे ललचाने के लिए रखा ही क्या है, कोई लालच होता तो चैनल या कॉल-सेंटर ही क़ाफ़ी होता. पर आपका बेटा हूँ, इस progressive society में इतना समझदार कहाँ? मुझे तो बस दिल खोलने को एक कागज़ मिले, और रंग उठा कर उस पर डोलूं, इतना ही लालच है. पर अकेले खेलने में वो बात कहाँ. एक लड़का और है जो खेला करता था मेरे साथ. अब कहता है मैं बड़ा हूँ... खेलूँगा नहीं पर कुछ-कुछ कहा करूँगा. कोई नहीं, यही सही...

तो सरकार, पंगा आप ही ने लिया है. जा पंगा लिया वो निभाना पड़ेगा. अभी कहना बहुत 'तन्हा' को है, सुनना बहुत मुझे...

बेटा